हेलो ज़िन्दगी; जब फेसबुक और व्हाट्सएप्प सब भूल गया

हेलो ज़िंदगी 

दादा दादी कुछ दिनों के लिए हमारे साथ रहने आये थे। खाने की टेबल लग चुकी थी। आज खुद दादी ने सबका मनपसन्द खाना बनाया था। दादा जी सबका इंतज़ार कर रहे थे। मैं भी कैंडी क्रश खेलते खेलते जा बैठा। दीदी थी कि फेसबुक छोड़ ही नहीं रही थीं। दादा जी पापा के कमरे की ओर बढ़े।पापा का एक हाथ मोबाइल पर तो दूसरा कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर था। दादा जी के चेहरे का गुस्सा देखकर मैंने तो चुपचाप गेम को पॉज़ कर दिया। उनका पारा और भी चढ़ गया जब मम्मी को भी सहेली से बातों में व्यस्त पाया।
“सब फौरन खाने की टेबल पर आयें। और अब से लेकर एक घण्टे तक कोई भी मोबाइल को हाथ नहीं लगाएगा” , उन्होंने चिल्लाकर फ़रमान सुनाया।
अब वो ठहरे बाप के भी बाप। सब तुरन्त आ पहुंचे।
उस दिन शायद सही मायने में सबने एक साथ खाना खाया था। खाने के बाद जो बातों का सिलसिला शुरु हुआ कि फेसबुक की ‘शेयर योर मेमोरीज़’ भी फेल हो गईं। पापा भी क्या ख़ूब शरारती थे आज पता चला। कभी मम्मी को भी कुकिंग नहीं आती थी, ये राज़ खुला।मेरी और दीदी के बचपन की कुछ बातें तो मम्मी को भी याद नहीं थी। पहले जहां सब सोच रहे थे कि बिना मोबाइल एक घण्टा कैसे गुज़रेगा वहीं समय कब बीता ‘लाइव’ बातों में पता ही नहीं चला। हर पांच मिनट में ऐसे ही मोबाइल चेक करने वालों को भान भी नहीं था समय का।दादा दादी से तो मिल ही रहे थे बहुत दिनों के बाद लेकिन यूं लगा कि हम आपस में भी कितने समय के बाद मिल रहे हैं।
मोबाइल का तो पता नहीं लेकिन आज पता चला कि ज़िन्दगी की कितनी ही ‘कॉल्स मिस्ड’ हो गयीं थीं जिनकी नोटिफिकेशन तक नहीं मिली थी।आज यूं लगा कि ज़िन्दगी एक बार फ़िर रिचार्ज हो गयी जब सबने मिलकर कहा “हेलो ज़िन्दगी”

स्रोत : Whatsapp😁

Leave a Reply