राग-द्वेष को छोड़ना ही मौन रखने के समान

Rag Dvesh Ko Chorna

मौन होना वाणी को शांत करना नहीं है। ऐसे तो सभी पशु मौन रखते हैं परंतु वह मौन नहीं कहा जाता।

‘मन का मौन’ राग द्वेष से अलग रहना है। जब मन राग-द्वेष को छोड़ देता है, तब मन का मौन होता है, तब जीव का मौन होता है।

संसार में हर जीव अंधा बना हुआ है। वह अपने को न देखकर दूसरों को देखने में लगा हुआ है।

जब इंसान अपने को देखेगा तभी उसे अपने अंदर के विकार नज़र आएंगे। संसार में ऐसे लोग बहुत कम हैं, जो अपनी कमियों का निरीक्षण करते हैं।

किसी ने यदि अपनी कमियों को समझना सीख लिया तो उसका उसी समय कल्याण हो जाएगा। जैसे ही हम अपने अंदर के राग-द्वेषों को समझ लेंगे, उसी समय माया का विनाश हो जाएगा।

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