शांति का सुगम मार्ग

जो संसार की माया चाहता है, वह सांसारिक पदार्थों में सुख को खोजता रहता है, किन्तु उसे मृग-मरीचिका की भाँति संसार में सुख नहीं मिलता है, क्योंकि सांसारिक पदार्थ नाशवान् हैं । संसार के भोगों से हमारी कभी तृप्ति नहीं हो सकती। भर्तृहरि जी कहते हैं-

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव याताः
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः।।

‘हमने विषयों को कभी नहीं भोगा, बल्कि विषयों ने ही हमें भोग लिया। हमने तपस्या भी नहीं की, चिन्तन में ही समय को गँवा दिया। हमसे कभी काल भी व्यतीत न हुआ, बल्कि हम ही उल्टे व्यतीत हो गये। फिर भी हमारी तृष्णाओं का अन्त नहीं हुआ और देखते-देखते हम बूढ़े हो गये।’

तात्पर्य यह है कि मनुष्य जब तक नश्वर भोगों में सुख खोजेगा, तब तक उसको कभी स्वप्न में भी विश्राम नहीं मिलेगा। एक परमात्मा का आश्रय लेने से ही उसे शान्ति का सुगम मार्ग दिखलाई पड़ेगा।

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