गुरु पूर्णिमा के बारे में विस्तार से जानिये

गुरु पूर्णिमा का महत्व, क्या है गुरु पूर्णिमा की कथा अगर आप इसके बारे में नहीं जानते तो आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे। कहते हैं कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं है। गुरु के बिना मनुष्य का जीवन निरर्थक है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई (रविवार को) को है।

इस दिन अपने – अपने गुरुओं की पूजा की जाती है। गुरु का धर्म अन्धकार में भटक रहे शिष्यों को सही मार्ग दिखाना है।इसलिए पुराणों में आषाढ़ की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है ताकि बादल रूपी शिष्यों की उपस्थिति से गुरु का माहात्म्य दर्शाया जा सके।

अगर आप गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु की पूजा करना चाहते हैं और आपको नहीं पता है कि गुरु पूर्णिमा कब है, क्या है गुरु पूर्णिमा का महत्व और क्या है गुरु पूर्णिमा की कथा तो चलिए जानते है गुरु पूर्णिमा की तिथि गुरु पूर्णिमा का महत्व और गुरु पूर्णिमा की कथा के बारे में…

गुरु पूर्णिमा का महत्व गुरु के बिना किसी भी व्यक्ति का जीवन निरर्थक है। गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं की जा सकती और न ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता। इसलिए गुरु की महिमा महान है।गुरु की महत्ता को दर्शाते हुए महान संत कबीरदास ने कहा है-

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाये,
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो मिलाये।”

यानि भगवान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्थान गुरु का होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिवस भी माना जाता है| व्यास संस्कृत के महान विद्वान थे। महाभारत के अठारहवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण गीता का उपदेश देते हैं। माना जाता है कि महर्षि वेदव्यास न हीं सभी 18 पुराणों की रचना की थी। इसलिए इन्हें वेदव्यास के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा इनका एक और नाम आदिगुरु भी है।इसलिए गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इन दिन को गुरु पूर्णिमा को विशेष रूप से वर्षा ऋतु में ही मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरुओं को अधिक महत्व दिया जाता है। यह दिन सभी गुरुओं को समर्पित है।

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है।वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।

शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है।अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है।

“अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया,चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नमः”

गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

गुरु पूर्णिमा की कथा

महामुनि अत्रि की पत्नी तथा परमसती अनुसुइया के सतीत्व की परीक्षा के लिये ब्रम्हा विष्णु तथा शिव ने सन्यासी का वेष धारण किया तथा उनसे नग्न होकर भिक्षा देने को कहा मां अनुसुइया ने अपने पतिव्रता धर्म के बल पर उन तीनो को बालक बनाकर दूध पिलाया। तीनों देवों ने सती अनुसुइया के गर्भ से जन्म लेने के वचन देने के बाद दुर्वासा शिव विष्णु दत्तात्रेय तथा ब्रम्हा ने चंद्र के रूप मे जन्म लिया। बाद मे दुर्वासा तथा चंद्र ने अपना अंश स्वरूप दत्तात्रेय के साथ कर दिया। भगवान दत्तात्रेय परमयोगी तथा आदि गुरु है। नवनाथ तथा 84 सिद्धों के ये गुरु है। सभी गुरुओं के ये गुरु है। दक्षिणभारत तथा महाराष्ट्र मे इनकी पूजा विशेष रूप से की जाती है। इनकी पूजा से जातक ज्ञान, भोग तथा मुक्ति पाता है। गुरु पूर्णिमा को इनकी विशेष पूजा की जाती है लोग नारीयल श्रीफल तथा भजन पूजन दक्षिणा से अपने गुरु की पूजा करते है।

प्रथम गुरु पूर्णिमा की कहानी

योग संस्कृति में, शिव को भगवान के रूप में नहीं देखा जाता, उन्हें पहले योगी, आदियोगी, के रूप में देखा जाता है। 15000 साल पहले, एक योगी हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों में दिखाई दिए थे। कोई भी नहीं जानता था कि वो कहाँ से आए थे, और उनका पिछ्ला जीवन कैसा था। उन्होंने अपना परिचय नहीं दिया था – इसलिए लोगों को उनका नाम भी नहीं पता था। इसलिए उन्हें आदियोगी या पहले योगी कहा जाता है।

वे बस आए और बैठ गए और कुछ भी नहीं किया। जीवन का एकमात्र संकेत उनकी आँखों से बह रहे परमानंद के आँसू थे। उसके अलावा, ऐसा भी नहीं लग रहा था कि वे सांस ले रहे हों। लोगों ने देखा कि वे ऐसा कुछ ऐसा अनुभव कर रहे थे, जिसे वे समझने में असमर्थ थे। लोग आए, इंतजार किया और चले गए क्योंकि वो योगी अन्य लोगों की मौजूदगी से अनजान थे।

कोई भी नहीं जानता था कि वो कहाँ से आए थे, और उनका पिछ्ला जीवन कैसा था। उन्होंने अपना परिचय नहीं दिया था – इसलिए लोगों को उनका नाम भी नहीं पता था। इसलिए उन्हें आदियोगी या पहले योगी कहा जाता है।

केवल सात लोग वहीँ रुके रहे। ये सातों उन योगी से सीखने का निश्चय कर चुके थे। आदियोगी ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने अनुरोध किया, “जो आप जानते हैं, वो हम भी जानना चाहते हैं।” उन्होंने उन्हें खारिज कर दिया, “तुम लोग मूर्ख हो, जिस तरह से तुम हो, वैसे तो तुम दस लाख वर्षों में नहीं जान पाओगे। तुम्हें तैयारी करने की जरूरत है। इसके लिए जबरदस्त तैयारी की आवश्यकता है। यह मनोरंजन नहीं है। ”

लेकिन वे सीखने के लिए बहुत आग्रह(जोर दे कर कहना) कर रहे थे, इसलिए आदियोगी ने उन्हें कुछ प्रारंभिक साधना दी। फिर उन सातों ने तैयारी शुरू कर दी – दिन सप्ताह में बदले, सप्ताह महीनों में, और महीने वर्षों में – वे तयारी करते रहे। आदियोगी बस उन्हें नजरअंदाज करते रहे। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने 84 साल तक साधना की थी। फिर, एक पूर्णिमा के दिन, 84 वर्षों के बाद, उस दिन जब सूर्य उत्तर से दक्षिण की ओर जा रहा था – जिसे इस परंपरा में दक्षिणायन के रूप में जाना जाता है – आदियोगी ने इन सात लोगों को देखा। वे ज्ञान के चमकदार पात्र बन गए थे। वे प्राप्त करने के लिए बिल्कुल परिपक्व(तैयार) थे। वे अब उन्हें अनदेखा नहीं कर सके।

आदियोगी उन्हें बारीकी से देखते रहे और अगली पूर्णिमा के दिन, उन्होंने एक गुरु बनने का फैसला किया। वो पूर्णिमा का दिन, गुरु पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा, वो पूर्णिमा है जब पहले योगी ने खुद को आदिगुरु या पहले गुरु में बदल दिया। वह दक्षिण की ओर मुड़ गए – यही कारण है कि वे दक्षिणामुर्ती के रूप में भी जाने जाते हैं – और सात शिष्यों को योग विज्ञान देना शुरू किया। इस प्रकार, दक्षिणायण की पहली पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा कहलाती है। इस दिन पहले गुरु प्रकट हुए थे।

माता पिता के बाद गुरु को जीवन में विशेष स्थान दिया गया है। माता पिता बालक को जीवन देते हैं जो गुरु उसे जीवन जीना सिखाता है। गुरु के इसी महत्व को मानते हुए हिन्दु मान्यताओं में गुरु पूर्णिमा पर्व मनाने का विधान है।

हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ‘गुरुपूर्णिमा’ कहते हैं। इस पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। पूरे भारत में यह त्योहार श्रृद्धा के साथ मनाया जाता है। इस बार गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई (रविवार को) को है। इस दिन गंगा या किसी अन्य नदी में स्नान करने के बाद पूजा करने का विधिविधान होता है। खासतौर से गुरु की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है। गुरु पूर्णिमा के दिन बहुत से लोग अपने गुरु के लिए व्रत भी रखते हैं।

कहा जाता है कि प्राचीन काल में गुरुकुलों में जब विद्यार्थी निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता तो गुरु पूर्णिमा के दिन ही वह श्रद्धा भाव से अपनी सामर्थ्यानुसार गुरु को दक्षिणा देकर उनका पूजन करता था। उसके बाद ही उन्हें धर्म ग्रन्थ, वेद, शास्त्र तथा अन्य विद्याओं की जानकारी और शिक्षण का प्रशिक्षण दिया जाता। गुरु को समर्पित इस पर्व से शिक्षा लेते हुए हम सभी को अपने गुरुओं के प्रति ह्रदय से श्रद्धा रखनी चाहिए।
अगली स्लाइड में पढ़ें गुरु पूर्णिमा व्रत के नियम-

कुछ अन्य कथाओं में कहा गया है कि जो आपको आपके कर्तव्य की ओर प्रेरित करता है ऐसे गुरु को प्रति श्रृद्धा प्रकट करने वाला यह पर्व होता है।

प्रातः घर की सफाई करें।स्नान आदि नित्य कर्म करें, कोशिश करनी चाहिए कि इस दिन किसी पवित्र नदी में स्नान किया जाए।घर में किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र फैलाकर उस पर पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण गंध से बारह-बारह रेखाएं बनाकर व्यासपीठ बनाएं। उसके बाद ‘गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये’ मंत्र से संकल्प करें।

इसके बाद दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ें। अब मन में ब्रह्माजी, व्यासजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम मंत्र से पूजा, हवन आदि करे के गुरु का ध्यान करना चाहिए। इस दिन वेदों और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन मनन भी अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन गरीबों और ब्राह्मणों को दान देने से अत्यधिक पुण्य प्राप्त होता है।

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