जानिए स्वधर्म कितने प्रकार के होते हैं ? मनुष्य को स्वधर्म का पालन क्यों करना चाहिए ? मुक्त होने के बाद स्वधर्म में क्या परिवर्तन आता है ?

प्रश्न  : स्वधर्म कितने प्रकार के होते हैं ? मनुष्य को स्वधर्म का पालन क्यों करना चाहिए ? मुक्त होने के बाद स्वधर्म में क्या परिवर्तन आता है ?
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उत्तर  : “स्वधर्म दो प्रकार का होता है | जब तक मनुष्य मुक्त नहीं हो जाता तब तक मुक्ति प्राप्त करने के लिए धर्म के अनुसार शरीर विशेष के कर्तव्य करने होते हैं | जब वह मुक्त हो जाता है तो उसका विशेष कर्तव्य या स्वधर्म आध्यात्मिक हो जाता है और देहात्मबुद्धि में नहीं रहता | जब तक देहात्मबुद्धि है तब तक ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के लिए स्वधर्म पालन अनिवार्य होता है | स्वधर्म का विधान भगवान् द्वारा होता है, जिसका स्पष्टीकरण चतुर्थ अध्याय में किया जायेगा | शारीरिक स्तर पर स्वधर्म को वर्णाश्रम-धर्म अथवा अध्यात्मिक बोध का प्रथम सोपान कहते हैं | वर्णाश्रम-धर्म अर्थात् प्राप्त शरीर के विशिष्ट गुणों पर आधारित स्वधर्म की अवस्था से मानवीय सभ्यता का शुभारम्भ होता है | वर्णाश्रम-धर्म के अनुसार किसी कार्य-क्षेत्र में स्वधर्म का निर्वाह करने से जीवन के उच्चतर पद को प्राप्त किया जा सकता है |”

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